हिन्दी वेबसाइट उद्घाटन

 

inauguration

” आज 16 अगस्त को श्री एम एस चौहान, अधीक्षण पुरातत्वविद , ने माउस का बटन दबा कर पुरातत्व संग्रहालय वैशाली के वेबसाइट के हिन्दी स्वरुप को जारी किया “”

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हमारे बारे में

ऐतिहासिक अभिषेक पुष्करनी के उत्तरी तट पर वैशाली संग्रहालय की स्थापना सन् 1971 ई0 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा विश्व के सबसे प्राचीन गणतंत्र वैशाली क्षेत्र  के पुरातात्विक अवशेषों को सुरक्षित रखने एवं उसे  जनसामान्य के अवलोकनार्थ किया गया। वैशाली जो  भगवान बुद्ध के चमत्कार एवं उनसे जुड़ी कई अन्य घटनाओं की साक्षी रही, वहीं जैन धर्म के 24 वें एवं अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्म स्थान के रूप में भी प्रसिद्ध है ।

वैशाली के विस्तृत क्षेत्र में फैले पुरावशेषों को सहेजने का प्रथम श्रेय यहाँ के स्थानीय नागरिकों को दिया जा सकता है। जिन्होनें स्वतंत्रता के पूर्व ही इस पवित्र कार्य का शुभारम्भ कर दिया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यहाँ के एक प्रशासनिक अधिकारी ने वैशाली संघ की स्थापना कर इस प्रयास को और  भी आगे बढाया। यहाँ के पुरावशेषों को महत्ता का सम्मान करते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1961 में संग्रहालय के भवन का निर्माण कराया। 1971 में यहाँ संग्रहालय की स्थापना के समय वैशाली संघ के सारे पुरावशेष इस संग्रहालय को दान में दे दिया गया। आज इस संग्रहालय में विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरातात्विक अन्वेषण एवं उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष संग्रहित एवं प्रदर्शित है ।

पुर्वानिमुख इस संग्रहालय में चार विथिकाँए एवं एक आंगन की योजना है । लगभग 2000 दो हजार पुरावशेषों से संग्रहित इस संग्रहालय के विथिकाँओं में 650  पुरावशेष जनसामान्य के अवलोकन हेतू प्रदर्शित हैं। इन पुरावशेषों का काल 6 ठी शताब्दी इसा पूर्व से बारहवीं सदी तक निरूपित किया गया है ।

खुलने का समय : 09:00 अपराहन – 05:00 पुर्वाहन ( शुक्रवार बंद )

प्रवेश शुल्क : 10 रु./ व्यक्ति ( 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क प्रवेश )

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प्रदर्शित वस्तुए

इस संग्रहालय में पुरातात्विक स्थल कोल्हुआ स्थित अशोक स्तंभ के इर्द-गिर्द के उतखनित अवशेषों का फाइवर में एक प्रतिरूप प्रदर्शित है, जो इस संग्रहालय का एक प्रमुख आकर्षण है। इसके अतिरिक्त वैशाली उत्खनन से ज्ञात सांस्कृतिक काल क्रम के स्तर बिन्यास को निर्धारित करते हुए एक रेखा चित्र भी प्रदर्शित है ।

वैशाली संग्रहालय में प्रदर्शित पुरावशेषों में सर्वप्रमुख काले बैसाल्ट पत्थर की मुकुटधारी बुद्ध की मुर्ति को माना जा सकता है, जिसमे उन्हें कल्पवृक्ष के निचे पदमासन में बैठे, आभूषणों से युक्त, भुमिस्पर्श मुद्रा में दर्शाया गया है। नवीं – दशवीं सदी की इस मुर्ति पर प्रचुर मात्रा में नक्कासी कर इसे अत्यधिक  आकर्षक बनाया गया है।

भगवान बुद्ध की एक सरविहिन मुर्ति भी इस संग्रहालय के आकर्षण का केन्द्र है। जिसमें उन्हें भुमिस्पर्श मुद्रा में प्रदर्शित  किया गया है। इस मुर्ति के आधार भाग में एक बन्दर को मद्दुपात्र लिए उत्कीर्ण किया गया है। यह मुर्ति भगवान बुद्ध के वैशाली चमत्कार को जीवन्त  करता है। काले बैसाल्ट पत्थर में निर्मित एक मनौती स्तूप भी इस संग्रहालय की शोभा बढ़ाते है, जिसके चारों दिशाओ में भगवान बुद्ध को चार अलग-अलग मुद्राओं में उत्कीर्ण किया गया है। इसके अतिरिक्त हिन्दू धर्म के देवी- देवताओं की भी मूर्तिया यहाँ प्रदर्शित है, जिसमें विष्णु तथा उमामाहेश्वर प्रमुख हैं। मगर के मुँह के सदृष्य एक पनाला भी दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र हैं ।

इस संग्रहालय में मृण मूर्तियों एवं सुन्दर नक्कासीदार ईटों तथा फलकों का भी एक विशाल संग्रह है। मृणकलक में प्रदर्शित एक नारी के सिरो भाग का चित्रण अत्यंत ही कुशलता से किया गया है। जिसमें उसके आँख, नाक तथा होंठ आदि को बडी ही बारीकि  से तराशा गया है। इसके अतिरिक्त उसके सिर तथा बालों को अलंकृत करने के लिए कई आभूषण तथा कान मे कर्णफूल भी बड़ी ही सुन्दरता से प्रदर्शित किया गया है ।

मृदभांडों  का एक अतिविशिष्ट तथा अनूठा संग्रह इस संग्रहालय का अन्य विशेषता है। लाल तथा सुनहरे चमक वाले उत्तरी कृष्ण मार्जित मृदभांड के कई आकार यहाँ  प्रदर्शित है, जो तत्कालिन समाज के उतकृष्ट कुम्हार कला का घोतक है। मृदभांडों के अन्य प्रकार एवं आकारो में लाल रंग के मृदभांडों के कटोरे, लघुपात्र, तश्तरी एवं मटका आदी है जो संग्रहालय के आकर्षण कों और भी बढ़ाता है ।

मृणमूर्तियों के विविध प्रकार भी इस संग्रहालय का अन्य आकर्षण है, जिसमें  मातृदेवी, माँ तथा शिशु, नागमेष तथा नर नारियों के धड़ भाग प्रमुख है। इसके अतिरिक्त पशु  मृणमूर्तियों में हाथी, घोड़ा, वृषभ, कुत्ता, बन्दर, मेष  तथा सर्प आदि प्रमुख है। कोल्हुआ के अशोक स्तंभ के पास स्वस्तिक आकार के महाविहार के उत्खनन से प्राप्त टेराकोटा से निर्मित एक वृताकार पैन प्राप्त हुआ है जो उस समय शौचालय के लिए प्रयुक्त होता था, जो इस संग्रहालय का अद्वितीय संग्रह है ।

प्राचीन मुद्राओं का भी एक अनुठा संग्रह इस संग्रहालय को विशिष्ट दर्जा दिलाता है। कई प्रकार के कीमती पत्थरों के मनके का प्रदर्शन भी दर्शकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। इसके अतिरिक्त चूड़ी, हड्डियों तथा सिंगो के औजार, अंजनश्लाका, प्रस्तर साँचा,  धातु गलाने का पात्र, वाणग्र तथा हाथी दांत की वस्तुएँ आदि भी प्रदर्शित है। जो उस काल की तकनीकी कुशलता की कहानी कह रहे हैं। लोहे तथा ताँबे के औजारों में काँटी, घंटी तथा वाणग्र आदि भी प्रमुख हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि संग्रहालय में प्रदर्शित पुरावशेष सिर्फ वस्तु मात्र न होकर प्राचिन वैभवशाली वैशाली के गौरवशाली इतिहास है।

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प्रदर्ष मंजूषा – 1 और 2

प्रदर्ष मंजूषा – 1 और 2 : इन दोनों प्रदर्ष मंजूषा में मानव मृण्मूर्तियों को प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्ष मंजूषा 1 में 27 एवं प्रदर्ष मंजूषा 2 में 21 पुरावशेषों को प्रदर्शित किया है जिसमें मानव मृण्मूर्तियों के सिर, बुद्ध की मूर्ति, हिन्दु देवी दुर्गा एवं नाग की मूर्तियाँ आदि प्रमुख है। इन सभी पुरावशेषों का काल तीसरी सदी ई0 पूर्व से साँतवीं -आठवीं शताब्दी ई0 तक माना गया है।

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प्रदर्ष मंजूषा – 3 और 4

प्रदर्ष मंजूषा – 3और 4 :   प्रदर्ष मंजूषा 3 और 4 में पशु मृणमूर्तियों को प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्ष मंजूषा 3 में 21 तथा प्रदर्ष मंजूषा 4 में 21 मूर्तियों को प्रदर्शित किया गया है जिसमें घोड़े, नाग, पक्षी, बन्दर, भेड़, हाथी, कुत्ता, गेंडा एवं कई पुरावशेषों को एकत्रित कर निर्मित बैलगाड़ी आदि प्रमुख है जिनका काल तीसरी शताब्दी ई0 पूर्व से चैथी शताब्दी ई0 तक माना गया है।

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