वैशाली संग्रहालय

ऐतिहासिक अभिषेक पुष्करनी के उत्तरी तट पर वैशाली संग्रहालय की स्थापना सन् 1971 ई0 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा विश्व के सबसे प्राचीन गणतंत्र वैशाली क्षेत्र  के पुरातात्विक अवशेषों को सुरक्षित रखने एवं उसे  जनसामान्य के अवलोकनार्थ किया गया। वैशाली जो  भगवान बुद्ध के चमत्कार एवं उनसे जुड़ी कई अन्य घटनाओं की साक्षी रही, वहीं जैन धर्म के 24 वें एवं अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्म स्थान के रूप में भी प्रसिद्ध है ।

वैशाली के विस्तृत क्षेत्र में फैले पुरावशेषों को सहेजने का प्रथम श्रेय यहाँ के स्थानीय नागरिकों को दिया जा सकता है। जिन्होनें स्वतंत्रता के पूर्व ही इस पवित्र कार्य का शुभारम्भ कर दिया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यहाँ के एक प्रशासनिक अधिकारी ने वैशाली संघ की स्थापना कर इस प्रयास को और  भी आगे बढाया। यहाँ के पुरावशेषों को महत्ता का सम्मान करते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1961 में संग्रहालय के भवन का निर्माण कराया। 1971 में यहाँ संग्रहालय की स्थापना के समय वैशाली संघ के सारे पुरावशेष इस संग्रहालय को दान में दे दिया गया। आज इस संग्रहालय में विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरातात्विक अन्वेषण एवं उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष संग्रहित एवं प्रदर्शित है ।

पुर्वानिमुख इस संग्रहालय में चार विथिकाँए एवं एक आंगन की योजना है । लगभग 2000 दो हजार पुरावशेषों से संग्रहित इस संग्रहालय के विथिकाँओं में 650  पुरावशेष जनसामान्य के अवलोकन हेतू प्रदर्शित हैं। इन पुरावशेषों का काल 6 ठी शताब्दी इसा पूर्व से बारहवीं सदी तक निरूपित किया गया है ।

खुलने का समय : 09:00 अपराहन – 05:00 पुर्वाहन ( शुक्रवार बंद )

प्रवेश शुल्क : 10 रु./ व्यक्ति ( 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए नि: शुल्क प्रवेश )

 

 

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वैशाली के दर्शनिए स्थल

 

 

 

 

कोल्हुआ:

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कोल्हुआ प्राचीन नगर वैशाली का ही एक भाग है। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार यहाँ स्थानीय कपि -प्रमुख ने भगवान बुद्ध को मधु से भरा एक पात्र प्रदान किया था। यह चमत्कार बुद्ध के जीवन के आठ महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। यह वही स्थान है जहाँ बुद्ध ने कई वर्षवास किया था। संघ में पहली बार स्त्रियों को प्रवेश भी यहीं मिला तथा यहाँ की प्रसिद्ध राजनर्तकी आम्रपाली भिक्षुणी बनी। अपने निर्वाण की घोषणा भी भगवान बुद्ध ने यहीं की थी।

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हाल के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा यहाँ स्थित अशोक स्तंभ के आस- पास कराये गये उत्खननों में एक मुख्य स्तूप के अतिरिक्त कुटागारशाला, स्वस्तिक आकार के संघाराम, एक तालाब, तथा कई मनौती स्तूप के प्राचीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहीं पर 11 मीटर ऊँचा एक पाषाण स्तम्भ अवस्थित है, जिसपर बैठे हुए सिंह की आकृति सुशोभित है। मौर्य- कालीन विशिष्ट चमक से युक्त इस स्तम्भ को स्थानीय रूप में लाटष् के नाम से जाना जाता है। सम्भवतः अशोक के स्तम्भों में यह प्राचीनतम है, जिसपर अशोक का कोई अभिलेख नहीं हैं, लेकिन गुप्तकालीन षंखलिपि के कुछ अक्षर इस पर उत्कीर्ण है।

 

 

vaishaliकपि प्रमुख द्वारा बुद्ध को मधु अर्पण किये जाने के स्मरणार्थ यहाँ ईंटों के स्तूप का निर्माण मूलतः मौर्यकाल के दौरान किया गया था जिसे कुषाण काल में और विस्तार किया गया तथा ईंटों का प्रदक्षिणा- पथ भी जोड़ा गया। तद्न्तर गुप्त काल में इसमें ईंटों द्वारा निर्मित आयक से अलंकृत किया गया।

लाट के निकट स्थित तालाब की पहचान श्मर्कट हृदश् के रूप में की गई है। माना जाता है कि इसे बुद्ध के लिए वानरों द्वारा खोदा गया था। ईंट से निर्मित सात सीढि़यों वाले तालाब की माप लगभग 65 से 35 मीटर है, जिसके दक्षिणी एवं पश्चिमी भुजाओं पर एक -एक स्नान घाट हैं।

 

कूटागारशालाः   उस स्थल को दर्शाता है जहाँ बुद्ध वैशाली में वर्षाऋतु के दौरान वास करते थे। उत्खनन में इसके तीन संरचनात्मक चरण प्राप्त हुए हैं। मूलतः सह शुंग – कुषाण काल में छोटा चैत्य था। दूसरे चरण में गुप्तकाल में इसे एक वृहत आकार वाले मंदिर का रूप दिया गया तथा तीसरे एवं अन्तिम चरण में परवर्ती गुप्तकाल के दौरान अनेक विभाजक दीवारें खडी कर इसे संघाराम में परिवर्तित कर दिया गया।

योजना विन्यास में स्वस्तिक सा प्रतीत होने वाले एक अन्य संघाराम में बारह कमरे हैं। पूर्व की ओर प्रवेश द्वार से युक्त इस संघाराम की प्रत्येक भुजा पर तीन कमरें हैं जिसके साथ बरामदा जुड़ा है तथा मध्य भाग में एक खुला प्रांगण है। इस संघाराम में दक्षिणी दीवार से जुड़े एक प्रसाधन कक्ष के अवशेष मिले हैं। जो सम्भवतः भिक्षुणियों के निवास के लिए बनाये गये संघाराम का अनूठा उदाहरण है।

अभिषेक पुष्करणी

abhishekhpushkarniप्रसिद्ध प्राचीन सरोवर  अभिषेक पुष्करणी के पास अवस्थित एक स्तूप का उत्खनन् वर्ष 1957-58  में काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान के तत्वाधान में  डा0 ए0 एस0 अल्तेकर द्वारा कराया गया, जिसमें प्रस्तर निर्मित एक अस्थि-मंजूषा प्राप्त हुई थी । इस स्तूप की पहचान बु़द्ध के मूल अस्थि अवशेष पर निर्मित आठ स्तूपों में से एक के रूप में की गई है ।

 

 

 

राजा  विशाल  का  गढ़

Raja_Vishal_Ka_Garhबसाढ़ स्थित राजा विशाल के गढ़ का अवशेष लगभग 480 से 230 मीटर के क्षेत्र में फैला है, जिसके कुछ भाग में उत्खनन् के दौरान ई0 पू0 6 ठीं शताब्दी से मुगलकाल तक के साक्ष्य मिले हैं।

 

 

 

इन स्थलों के उत्खनन् के दौरान प्राप्त हुए पुरावशेषों में मूल्यवान पत्थर के मनके, मृण्मूर्तियाँ, मुद्रा एवं मुद्रांक, अर्ध मूल्यवान रत्न जडि़त ईंटें, अभिलेखयुक्त मृदभाण्ड तथा मुकुटधारी बन्दर की आकर्षक मृण्मूर्ति इत्यादि प्रमुख हैं।

 

 

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